पान सिंह तोमर की जीवनी Paan Singh Tomar Biography In Hindi

 मानसिंह, फूलन देवी, माधव सिंह, विक्रम अल्लाह और मुस्तकीम यह सभी ऐसे खतरनाक डाकुओं के नाम हैं जिनके बगावत की कहानी आज की चंबल नदी की बून्द नंद में और चंबल की ऊंची नीची पहाड़ों में सुनने को मिल जाएगी। खूंखार डाकू चंबल की पहाड़ियों में पनाह ले रखी थी। 





 साथ ही साथ यहीं पर वे अपने आतंकी के पहियों को भी आगे बढ़ा रही थी। लेकिन दोस्तों इन डाकुओं में से एक कहानी ऐसी भी सामने आती है जो कि इससे बिलकुल ही विपरीत थी। और यह कहानी है पान सिंह तोमर की। पान सिंह तोमर जीवन के शुरुआती दौर में लोगों का प्यार और सम्मान जीता। 

लेकिन वही उम्र के दूसरे दौर में उन्हे लोगों से नफरत एक बागी  की तरह अपना जीवन बिताना पड़ा। 1932 से मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के एक छोटे से गांव की Bhidosa  में पान सिंह तोमर का जन्म हुआ। पान सिंह तोमर बचपन से ही देश की सेवा करना चाहते थे। 

और इसीलिए आगे चलकर उन्होंने भारतीय सैनिक के तौर पर अपना करियर बनाया। और फिर पहली बार उनकी जॉइनिंग उत्तराखंड के रुड़की शहर में सूबेदार के पद पर हुवी। सिपाही में  ज्वाइन करने के बाद से ही उन्हें यह पता चला कि वह एक सिपाही होने के साथ-साथ एक बेहथिन एथलीट भी हैं। 

उनमे बिना थके हुवे बहुत दूर तक दौड़ने का खास टैलेंट मौजूद था। और इसी वजह से उन्हें लंबी दौड़ की खेल के लिए तैयार किया गया।  और फिर सेना में रहकर उन्होंने ना सिर्फ एक सिपाही होने का फर्ज निभाया  बल्कि एक होनहार खिलाड़ी के रूप में नेशनल और इंटरनेशनल मैडल को जीतकर देश का नाम भी रोशन किया। 

पान  सिंह  तोमर की  मुख्य जानकारी


Paan Singh Tomar Biography
जन्मदिन की तारीख1 जनवरी, 1932 (शुक्रवार)
पेशासैन्य कर्मी (भारतीय सेना में सूबेदार)
धावक
ऊंचाईसेंटीमीटर में– 185 सेमी
सेवा के वर्ष1949-1977
पत्नीइंदिरा सिंह
मौत की तिथि1 अक्टूबर 1981 (गुरुवार)


पान सिंह तोमर १९५८ में  टोक्यो एशियाई गेम्स में इंडिया को रेप्रेसन्ट किया था। वह ७ सालो तक Steeplechase   के नेशनल चैंपियन भी रहे।  साथ ही उन्हों ने 9 मिनट 2 सेकंड में 3000 मीटर की दौड़ का बेहतरीन रिकॉर्ड बनाया था। जिस्से कि अगले 10 सालों तक कोई भी नहीं तोड़ सका था। और खेल में उनकी बेहतरीन सफलता को देखते हुए 1962 और 1965 में हुए गए युद्ध में भी उन्हे लड़ने की परमिशन नहीं मिली।  

क्यों की शायद  देश इस जांबाज खिलाड़ी को कभी भी नहीं खोना चाहता था। और इस तरह से आगे चलकर 1972 में पान सिंह ने रिटायरमेंट ले लिया। और फिर रिटायरमेंट के बाद वह अपनी बची हुवी जिंदगी को चैन से बिताने के लिए वह अपने गांव चले गए। लेकिन गांव वापस आने के बाद से वहां के एक दबंग बाबू सिंह के साथ उनका जमीनी विवाद हो गया । 

 दरासल  बाबू सिंह पूरे गांव पर अपना धाक जमा कर रखता  था। और उसके पास लोगों को डराने के लिए 7 लाइसेंसी बंदूक भी थी। पान सिंह तोमर और बाबू सिंह के बीच विवाद इस बात पर हुवा कि बहुत समय पहले पान सिंह के पूर्वजों ने बाबू सिंह के वहां अपनी जमीन गिरवी रखी हुई थी। 

और जब गांव  वापस अपनी जमीन लेने गए तब बाबू सिंह ने उनकी जमीन को वापस करने के लिए साफ साफ मना कर दिया। और फिर लड़ाई झगड़े से दूरी बनाए रखने वाले पान सिंह इस विवाद को सुलझाने के लिए अपने जिले के कलेक्टर के पास जा पहुंचे।

जहां पर वह अपने जीवन की उपलब्धियां जैसे कि अपने मेडल्स और डाक्यूमेंट्स को लेकर गया हुए थे। लेकिन कलेक्टर से गुहार लगाने के बाद पान सिंह के किसी भी बात को उन्होने नहीं सुना। और उल्टा उनके मेडल डॉक्यूमेंट को फेक कर। उन्हें बेइज्जत करके वहां से बाहर निकाल दिया। 

और फिर यहीं से पांच सिंह को अपने अभी तक अचीवमेंट्स बेकार लगने लगे थे। हालांकि अभी भी हार ना मानते हुए पाल सिंह ने गांव के पंचायत से इस मुद्दे के लिए इंसाफ की गुहार लगाई। लेकिन पंचायत में यह फैसला सुनाया की जमीन को छुड़वाने के लिए पान सिंह तोमर को ३००० रुपये बाबू सिंह को देने होंगे। 

लेकिन यह फैसला पान सिंह को बिल्कुल भी समझ नहीं आया। और उन्होंने जमीन को पाने के लिए यह रकम चुकाने से साफ साफ मना कर दिया। लेकिन बदले की भावना से कुछ दिनों के बाद से ही बाबू सिंह ने अपनी दबंगई दिखानी शुरू कर दी थी। और फिर पान सिंह जब अपने घर पर नहीं थे तब उनकी ९५ साल की बूढी माँ को खूब मारापीट।   

और फिर घर पहुंचने पर अपनी मां को घायल देखा  पान सिंह तोमर पूरी तरह से आगबबूला हो गए। और फिर उन्होंने गलत रास्ते पर ही सही लेकिन अपना बदला लेने का फैसला कर लिया।  यही  से शुरू हो जाती है पान सिंह तोमर बागी बनने की कहानी। और फिर एक दिन पान सिंह तोमर अपने भतीजे बलवंत के साथ मिलकर बाबू सिंह को घेरने की कोशिश करने लगे। 

और लगभग 1 किलोमीटर तक बाबू सिंह को दौड़ाने के बाद तोमर के बंदूक की गोलियां बाबू सिंह को बढ़ डालती हे। और यहाँ से पान सिंह की छवि एक हीरो से बदलकर चंबल की खतरनाक चेहरे में तब्दील हो जाती है। और यहीं से पान सिंह तोमरचम्बल  की घाटियों में पनाह लेकर खुदको बागी घोसित कर  देता है। 

एक समय भारत के लिए ट्रैक पर दौड़ने वाला पैर अब चंबल के  काटे भरे  पहाड़ियों में भागते हुए दिखाई दे रहे थे।आगे चलकर पान सिंह तोमर नाम खतरनाक डकैती और हत्या करने के लिए जाना जाने लगा । और वह इतना खतरनाक हो चुका था की पुलिस भी उनके नाम से थरथर कप्ति थी।  

उस समय पैन सिंह को पकड़ने के लिए १०००० हजारों रुपए का ही नाम पर रखा गया था। और फिर आखिरकार 1 अक्टूबर 1981 को इंस्पेक्टर महेंद्र प्रताप सिंह और उनके 500 जवानों की स्पेशल टीम ने तोमर की घेराबंदी करके उसे मार गिराया।  साथ ही इस ऑपरेशन में तोमर के गैंग के १४  और भी साथी मारे गए थे।  

गनफाइट लगभग 12 घंटे तक चली थी।  और पान सिंह तोमर की खबर मोदी राम नाम के आदमी ने पुलिस को दी थी।  और ईएसएस तरह ख़तम हुवी जाबाज सिपाही लाजबाब खिलाड़ी और एक बागी की कहानी।  पान सिंह की बायोपिक पार् एक हिंदी फिल्म भी २०१२ में बानी हुवी हे।  


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